30 April, 2009

श्री महालक्ष्मी स्तुति

नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्षि्म नमोस्तु ते ॥1॥

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि।
सर्वपापहरे देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते ॥2॥

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि।
सर्वदु:खहरे देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते ॥3॥

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्ति मुक्ति प्रदायिनि।
मन्त्रपूते सदा देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते ॥4॥

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्ति महेश्वरि।
योगजे योगसम्भूते महालक्षि्म नमोस्तु ते ॥5॥

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्ति महोदरे।
महापापहरे देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते ॥6॥

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि।
परमेशि जगन्मातर्महालक्षि्म नमोस्तु ते ॥7॥

श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते।
जगत्सि्थते जगन्मातर्महालक्षि्म नमोस्तु ते ॥8॥

महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं य: पठेद्भक्ति मान्नर:।
सर्वसिद्धिमवापनेति राज्यं प्रापनेति सर्वदा ॥9॥

एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्।
द्विकालं य: पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वित:॥10॥

त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम्।
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा ॥11॥

श्री शिवपञ्चाक्षर स्तोत्रम्

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै न काराय नम: शिवाय ॥1॥

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय। तस्मै म काराय नम: शिवाय ॥2॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द- सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शि काराय नम: शिवाय ॥3॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य- मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै व काराय नम: शिवाय ॥4॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै य काराय नम: शिवाय ॥5॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं य: पठेच्छिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥6॥

श्रीरुद्राष्टकम्

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजे5हं ॥1॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतो5हं ॥2॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा ॥3॥

चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालं।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥4॥

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रय: शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजे5हं भवानीपतिं भावगम्यं ॥5॥

कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥6॥

न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥7॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतो5हं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जराजन्म दु:खौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शंभो। ॥8॥

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु: प्रसीदति॥

29 April, 2009

जगद्गुरु शंकराचार्य

एक संन्यासी बालक, जिसकी आयु मात्र 7 वर्ष थी, गुरुगृह के नियमानुसार एक ब्राह्मण के घर भिक्षा माँगने पहुँचा। उस ब्राह्मण के घर में भिक्षा देने के लिए अन्न का दाना तक न था।

ब्राह्मण पत्नी ने उस बालक के हाथ पर एक आँवला रखा और रोते हुए अपनी विपन्नता का वर्णन किया। उसकी ऐसी अवस्था देखकर उस प्रेम-दया मूर्ति बालक का हृदय द्रवित हो उठा। वह अत्यंत आर्त स्वर में माँ लक्ष्मी का स्तोत्र रचकर उस परम करुणामयी से निर्धन ब्राह्मण की विपदा हरने की प्रार्थना करने लगा।

उसकी प्रार्थना पर प्रसन्न होकर माँ महालक्ष्मी ने उस परम निर्धन ब्राह्मण के घर में सोने के आँवलों की वर्षा कर दी। जगत्‌ जननी महालक्ष्मी को प्रसन्न कर उस ब्राह्मण परिवार की दरिद्रता दूर करने वाला, दक्षिण के कालाड़ी ग्राम में जन्मा वह बालक था- 'शंकर', जो आगे चलकर 'जगद्गुरु शंकराचार्य' के नाम से विख्यात हुआ।

इस महाज्ञानी शक्तिपुंज बालक के रूप में स्वयं भगवान शंकर ही इस धरती पर अवतीर्ण हुए थे। इनके पिता शिवगुरु नामपुद्रि के यहाँ विवाह के कई वर्षों बाद तक जब कोई संतान नहीं हुई, तब उन्होंने अपनी पत्नी विशिष्टादेवी के साथ पुत्र प्राप्ति की कामना से दीर्घकाल तक चंद्रमौली भगवान शंकर की कठोर आराधना की।

आखिर प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और कहा- 'वर माँगो।' शिवगुरु ने अपने इष्टप्रभु से एक दीर्घायु सर्वज्ञ पुत्र माँगा। भगवान शंकर ने कहा- 'वत्स, दीर्घायु पुत्र सर्वज्ञ नहीं होगा और सर्वज्ञ पुत्र दीर्घायु नहीं होगा। बोलो तुम कैसा पुत्र चाहते हो?' तब धर्मप्राण शास्त्रसेवी शिवगुरु ने सर्वज्ञ पुत्र की याचना की। औढरदानी भगवान शिव ने पुनः कहा- 'वत्स तुम्हें सर्वज्ञ पुत्र की प्राप्ति होगी। मैं स्वयं पुत्र रूप में तुम्हारे यहाँ अवतीर्ण होऊँगा।'

कुछ समय के पश्चात ई. सन्‌ 686 में वैशाख शुक्ल पंचमी (कुछ लोगों के अनुसार अक्षय तृतीया) के दिन मध्याह्नकाल में विशिष्टादेवी ने परम प्रकाशरूप अति सुंदर, दिव्य कांतियुक्त बालक को जन्म दिया। देवज्ञ ब्राह्मणों ने उस बालक के मस्तक पर चक्र चिह्न, ललाट पर नेत्र चिह्न तथा स्कंध पर शूल चिह्न परिलक्षित कर उसे शिवावतार निरूपित किया और उसका नाम 'शंकर' रखा। इन्हीं शंकराचार्यजी को प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल पंचमी को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए श्री शंकराचार्य जयंती मनाई जाती है।

जिस समय जगद्गुरु शंकराचार्य का आविर्भाव हुआ, उस समय भारत में वैदिक धर्म म्लान हो रहा था तथा मानवता बिसर रही थी, ऐसे में आचार्य शंकर मानव धर्म के भास्कर प्रकाश स्तंभ बनकर प्रकट हुए। मात्र 32 वर्ष के जीवनकाल में उन्होंने सनातन धर्म को ऐसी ओजस्वी शक्ति प्रदान की कि उसकी समस्त मूर्छा दूर हो गई।

शंकराचार्यजी तीन वर्ष की अवस्था में मलयालम का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर चुके थे। इनके पिता चाहते थे कि ये संस्कृत का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करें। परंतु पिता की अकाल मृत्यु होने से शैशवावस्था में ही शंकर के सिर से पिता की छत्रछाया उठ गई और सारा बोझ शंकरजी की माता के कंधों पर आ पड़ा। लेकिन उनकी माता ने कर्तव्य पालन में कमी नहीं रखी॥ पाँच वर्ष की अवस्था में इनका यज्ञोपवीत संस्कार करवाकर वेदों का अध्ययन करने के लिए गुरुकुल भेज दिया गया। ये प्रारंभ से ही प्रतिभा संपन्न थे, अतः इनकी प्रतिभा से इनके गुरु भी बेहद चकित थे।

अप्रतिम प्रतिभा संपन्न श्रुतिधर बालक शंकर ने मात्र 2 वर्ष के समय में वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत आदि ग्रंथ कंठस्थ कर लिए। तत्पश्चात गुरु से सम्मानित होकर घर लौट आए और माता की सेवा करने लगे। उनकी मातृभक्ति इतनी विलक्षण थी कि उनकी प्रार्थना पर आलवाई (पूर्णा) नदी, जो उनके गाँव से बहुत दूर बहती थी, अपना रुख बदल कर कालाड़ी ग्राम के निकट बहने लगी, जिससे उनकी माता को नदी स्नान में सुविधा हो गई।

कुछ समय बाद इनकी माता ने इनके विवाह की सोची। पर आचार्य शंकर गृहस्थी के झंझट से दूर रहना चाहते थे। एक ज्योतिषी ने जन्म-पत्री देखकर बताया भी था कि अल्पायु में इनकी मृत्यु का योग है। ऐसा जानकर आचार्य शंकर के मन में संन्यास लेकर लोक-सेवा की भावना प्रबल हो गई थी। संन्यास के लिए उन्होंने माँ से हठ किया और बालक शंकर ने 7 वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण कर लिया। फिर जीवन का उच्चतम लक्ष्य प्राप्त करने के लिए माता से अनुमति लेकर घर से निकल पड़े।....

वे केरल प्रदेश से लंबी पदयात्रा करके नर्मदा तट स्थित ओंकारनाथ पहुँचे। वहाँ गुरु गोविंदपाद से योग शिक्षा तथा अद्वैत ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करने लगे। तीन वर्ष तक आचार्य शंकर अद्वैत तत्व की साधना करते रहे। तत्पश्चात गुरु आज्ञा से वे काशी विश्वनाथजी के दर्शन के लिए निकल पड़े। जब वे काशी जा रहे थे कि एक चांडाल उनकी राह में आ गया। उन्होंने क्रोधित हो चांडाल को वहाँ से हट जाने के लिए कहा तो चांडाल बोला- 'हे मुनि! आप शरीरों में रहने वाले एक परमात्मा की उपेक्षा कर रहे हैं, इसलिए आप अब्राह्मण हैं। अतएव मेरे मार्ग से आप हट जाएँ।'

चांडाल की देववाणी सुन आचार्य शंकर ने अति प्रभावित होकर कहा-'आपने मुझे ज्ञान दिया है, अतः आप मेरे गुरु हुए।' यह कहकर आचार्य शंकर ने उन्हें प्रणाम किया तो चांडाल के स्थान पर शिव तथा चार देवों के उन्हें दर्शन हुए।

काशी में कुछ दिन रहने के दौरान वे माहिष्मति नगरी में आचार्य मंडल मिश्र से मिलने गए। आचार्य मिश्र के घर जो पालतू मैना थी वह भी वेद मंत्रों का उच्चारण करती थी। मिश्रजी के घर जाकर आचार्य शंकर ने उन्हें शास्त्रार्थ में हरा दिया। पति आचार्य मिश्र को हारता देख पत्नी आचार्य शंकर से बोलीं- 'महात्मन्‌! अभी आपने आधे ही अंग को जीता है। अपनी युक्तियों से मुझे पराजित करके ही आप विजयी कहला सकेंगे।'

तब मिश्रजी की पत्नी शारदा ने कामशास्त्र पर प्रश्न करने प्रारंभ किए। किंतु आचार्य शंकर तो बाल-ब्रह्मचारी थे, अतः काम से संबंधित उनके प्रश्नों के उत्तर कहाँ से देते? इस पर उन्होंने शारदा देवी से कुछ दिनों का समय माँगा तथा पर-काया में प्रवेश कर उस विषय की सारी जानकारी प्राप्त की। इसके बाद आचार्य शंकर ने शारदा को भी शास्त्रार्थ में हरा दिया।

काशी में प्रवास के दौरान उन्होंने और भी बड़े-बड़े ज्ञानी पंडितों को शास्त्रार्थ में परास्त किया और गुरु पद पर प्रतिष्ठित हुए। अनेक शिष्यों ने उनसे दीक्षा ग्रहण की। इसके बाद वे धर्म का प्रचार करने लगे। वेदांत प्रचार में संलग्न रहकर उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना भी की।

अद्वैत ब्रह्मवादी आचार्य शंकर केवल निर्विशेष ब्रह्म को सत्य मानते थे और ब्रह्मज्ञान में ही निमग्न रहते थे। एक बार वे ब्रह्म मुहूर्त में अपने शिष्यों के साथ एक अति सँकरी गली से स्नान हेतु मणिकर्णिका घाट जा रहे थे। रास्ते में एक युवती अपने मृत पति का सिर गोद में लिए विलाप करती हुई बैठी थी। आचार्य शंकर के शिष्यों ने उस स्त्री से अपने पति के शव को हटाकर रास्ता देने की प्रार्थना की, लेकिन वह स्त्री उसे अनसुना कर रुदन करती रही।

तब स्वयं आचार्य ने उससे वह शव हटाने का अनुरोध किया। उनका आग्रह सुनकर वह स्त्री कहने लगी- 'हे संन्यासी! आप मुझसे बार-बार यह शव हटाने के लिए कह रहे हैं। आप इस शव को ही हट जाने के लिए क्यों नहीं कहते?' यह सुनकर आचार्य बोले- 'हे देवी! आप शोक में कदाचित यह भी भूल गईं कि शव में स्वयं हटने की शक्ति ही नहीं है।' स्त्री ने तुरंत उत्तर दिया- 'महात्मन्‌ आपकी दृष्टि में तो शक्ति निरपेक्ष ब्रह्म ही जगत का कर्ता है। फिर शक्ति के बिना यह शव क्यों नहीं हट सकता?' उस स्त्री का ऐसा गंभीर, ज्ञानमय, रहस्यपूर्ण वाक्य सुनकर आचार्य वहीं बैठ गए। उन्हें समाधि लग गई। अंतःचक्षु में उन्होंने देखा- सर्वत्र आद्याशक्ति महामाया लीला विलाप कर रही हैं। उनका हृदय अनिवर्चनीय आनंद से भर गया और मुख से मातृ वंदना की शब्दमयी धारा स्तोत्र बनकर फूट पड़ी।

अब आचार्य शंकर ऐसे महासागर बन गए, जिसमें अद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, विशिष्टा द्वैतवाद, निर्गुण ब्रह्म ज्ञान के साथ सगुण साकार की भक्ति की धाराएँ एक साथ हिलोरें लेने लगीं। उन्होंने अनुभव किया कि ज्ञान की अद्वैत भूमि पर जो परमात्मा निर्गुण निराकार ब्रह्म है, वही द्वैत की भूमि पर सगुण साकार है। उन्होंने निर्गुण और सगुण दोनों का समर्थन करके निर्गुण तक पहुँचने के लिए सगुण की उपासना को अपरिहार्य सीढ़ी माना। ज्ञान और भक्ति की मिलन भूमि पर यह भी अनुभव किया कि अद्वैत ज्ञान ही सभी साधनाओं की परम उपलब्धि है।

उन्होंने 'ब्रह्मं सत्यं जगन्मिथ्या' का उद्घोष भी किया और शिव, पार्वती, गणेश, विष्णु आदि के भक्तिरसपूर्ण स्तोत्र भी रचे, 'सौन्दर्य लहरी', 'विवेक चूड़ामणि' जैसे श्रेष्ठतम ग्रंथों की रचना की। प्रस्थान त्रयी के भाष्य भी लिखे। अपने अकाट्य तर्कों से शैव-शाक्त-वैष्णवों का द्वंद्व समाप्त किया और पंचदेवोपासना का मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने आसेतु हिमालय संपूर्ण भारत की यात्रा की और चार मठों की स्थापना करके पूरे देश को सांस्कृतिक, धार्मिक, दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा भौगोलिक एकता के अविच्छिन्न सूत्र में बाँध दिया। उन्होंने समस्त मानव जाति को जीवन्मुक्ति का एक सूत्र दिया-

'
दुर्जनः सज्जनो भूयात सज्जनः शांतिमाप्नुयात्‌।
शान्तो मुच्येत बंधेम्यो मुक्तः चान्यान्‌ विमोच्येत्‌॥'

अर्थात दुर्जन सज्जन बनें, सज्जन शांति बनें। शांतजन बंधनों से मुक्त हों और मुक्त अन्य जनों को मुक्त करें। अपना प्रयोजन पूरा होने बाद तैंतीस वर्ष की अल्पायु में उन्होंने इस नश्वर देह को छोड़ दिया।

(source:
डॉ.पुष्पारानी गर्ग, Webdunia.com)

24 April, 2009

महेश गिरिजी का मंत्र नाद

कल मैंने एक ऐसे सिंहको देखा जो सारे भारत में हिन्दुओ को जगाने निकल पड़ा हे. इस सिंह का नाम हे - महेश गिरिजी.

पिछले कई दिन से यहाँ हिम्मतनगर में मंत्र नाद के बारे में सुन रहा था. ये अभियान आर्ट ऑफ़ लिविंग द्वारा महेश गिरिजी चला रहे हे. जब पहेली बार इस के बारे में सुना तो लगा की ये भी कोई राजकीय प्रचार अभियान होगा. लेकिन जब मेने इस कार्यक्रम को देखा तो पाया की ये कोई राजकीय प्रचार नहीं लेकिन एक सिंह की गर्जना हे.

कल हिम्मतनगर में कोलेज ग्राउंड में ये मंत्र नाद का समारोह था. ऐसा लग रहा था की जैसे समस्त हिन्दू एक ही जगह इकठ्ठा हो गए हो. समारोह का आयोजन बहुत ही प्रभावशाली था. शाम ७ बजे गणेश वंदना से समारोह शुरू हुआ. ज़ब महेश गिरिजी स्टेज पर उपस्थित हुए तब कृष्णका बहुत ही मन मोहक भजन चल रहा था, एसा लाग रहा था की जैसे स्वयं कृष्ण ही स्टेज पे आ गए हो. संगीत और भक्ति का समन्वय देखने को मिला.

उसके बाद महेश गिरिजी ने बड़ी नम्रता से अपना प्रवचन शुरू किया. उनके प्रवचन के बारे में क्या लिखू ! वो जब प्रवचन कर रहे थे तो लगता था की जैसे कोई सिंह गर्जना कर रहा हो. उनके प्रवचन में सिर्फ एक ही बात बार बार आ रही थी - भारत में जो भी कुछ परिवर्तन करना हे वो हमको ही करना हे. उनके प्रवचन में कोई भी राजकीय नेता या पक्ष के बारे में प्रचार नहीं था. वो सिर्फ हिन्दूओ के बारे में बोल रहे थे. अगर हम लोगो को चेन से सोना हे तो सब से पहले संगठित होना पड़ेगा. हमें अपनी जाती और  गोत्रको भूल जाना होगा और सिर्फ हिन्दू होनी की पहेचान बनानी होगी.

अंत में समारोह में उपस्थित सभी लोगो ने मोमबत्ती जलाई और महेश गिरिजी ने सभी हिन्दूओ को संगठित होने का संकल्प दिलवाया. महत्वपूर्ण बात ये हे की महेश गिरिजी श्री श्री रविशंकर के परम निकट रह चुके हे. उनकी वाणी में राजकारण नहीं था, धर्मं को बचाने के लिए संगठित होने की गर्जना थी. जो लोग एसा मानते हे की धर्मं सिर्फ भजन, सत्संग ही कर सकता हे बाकि कुछ नहीं - उनको में कहुगा की एक बार महेश गिरिजी को जरूर सुने.

इस अभियान को मंत्र नाद नाम दिया हे - जो बिलकुल सही हे. अगर आप को भी इस मंत्र नाद में सामिल होने का अवसर मिला हो तो आप की प्रतिक्रिया Comment में लिख सकते हे.

15 April, 2009

शिंगणापुर का शनिदेव मंदिर

देश में सूर्यपुत्र शनिदेव के कई मंदिर हैं। उन्हीं में से एक प्रमुख है महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर का शनि मंदिर। विश्व प्रसिद्ध इस शनि मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ स्थित शनिदेव की पाषाण प्रतिमा बगैर किसी छत्र या गुंबद के खुले आसमान के नीचे एक संगमरमर के चबूतरे पर विराजित है।

शिंगणापुर के इस चमत्कारी शनि मंदिर में स्थित शनिदेव की प्रतिमा लगभग पाँच फीट नौ इंच ऊँची व लगभग एक फीट छह इंच चौड़ी है। देश-विदेश से श्रद्धालु यहाँ आकर शनिदेव की इस दुर्लभ प्रतिमा का दर्शन लाभ लेते हैं। यहाँ के मंदिर में स्त्रियों का शनि प्रतिमा के पास जाना वर्जित है। महिलाएँ दूर से ही शनिदेव के दर्शन करती हैं।

सुबह हो या शाम, सर्दी हो या गर्मी यहाँ स्थित शनि प्रतिमा के समीप जाने के लिए पुरुषों का स्नान कर पीताम्बर धोती धारण करना अत्यावश्क है। ऐसा किए बगैर पुरुष शनि प्रतिमा का स्पर्श नहीं पर सकते हैं। इस हेतु यहाँ पर स्नान और वस्त्रादि की बेहतर व्यवस्थाएँ हैं।

खुले मैदान में एक टंकी में कई सारे नल लगे हुए हैं, जिनके जल से स्नान करके पुरुष शनिदेव के दर्शनों का लाभ ले सकते हैं। पूजनादि की सामग्री के लिए भी यहाँ आसपास बहुत सारी दुकानें हैं, जहाँ से आप पूजन सामग्री लेकर शनिदेव को अर्पित कर सकते हैं।

यदि आप पहली बार शनि शिंगणापुर जा रहे हैं तो यहाँ भक्तों की श्रद्धा व विश्वास का नजारा देखकर आप आश्चर्यचकित हो जाएँगे। केवल बड़े-बुजुर्ग ही नहीं अपितु तीन-चार वर्ष के शिशु भी इस शीतल जल से स्नान कर शनिदेव के दर्शन के लिए अपने पिता के साथ चल पड़ते हैं। शनि मंदिर में दर्शन करने वाला हर पुरुष श्रद्धालु आपको यहाँ पीताम्बरधारी ही नजर आएगा।

शनि मंदिर का एक विशाल प्रांगण है जहाँ दर्शन के लिए भक्तों की कतारें लगती हैं। मंदिर प्रशासन द्वारा ‍शनिदेव के दर्शनों की बेहतर व्यवस्थाएँ की गई हैं, जिससे भक्तों को यहाँ दर्शन के लिए धक्का-मुक्की जैसी किसी भी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ता है। जब आप यहाँ स्थित विशाल शनि प्रतिमा के दर्शन करेंगे तो आप स्वयं सूर्यपुत्र शनिदेव की भक्ति में रम जाएँगे। प्रत्येक शनिवार, शनि जयंती व शनैश्चरी अमावस्या आदि अवसरों पर यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि शिंगणापुर के अधिकांश घरों में खिड़की, दरवाजे और तिजौरी नहीं है। दरवाजों की जगह यदि लगे हैं तो केवल पर्दे। ऐसा इसलिए क्योंकि यहाँ चोरी नहीं होती। कहा जाता है कि जो भी चोरी करता है उसे शनि महाराज उसकी सजा स्वयं दे देते हैं। जब गाँव वालों पर शनिदेव की कृपा है व चोरी का भय ही नहीं है तो दरवाजे, खिड़की, अलमारी व तिजौरी का क्या काम है?

कैसे पहुँचें शिंगणापुर :
शिर्डी से शिंगणापुर की दूरी - 70 किमी
नासिक से शिंगणापुर की दूरी - 170 किमी
औरंगाबाद से शिंगणापुर की दूरी - 68 किमी
अहमद नगर से शिंगणापुर की दूरी - 35 किमी।

(source: webdunia.com)

क्या कहते हे लालकृष्‍ण आडवाणीके सितारे

भाजपाके नेता लालकृष्‍ण आडवाणी का जन्म 8 नवंबर 1927 को सुबह 9.16 पर हुआ. आडवाणीकी जन्म कुंडली में तुला लग्न हे. चन्द्र राशिः वृषभ हे. कुंडली में गुरु, राहु, बुध, केतु, चंद्र प्रबल स्थिति में (स्वराशि, उच्च) हैं. पंचम भावः पर शुक्र का प्रभाव है. आडवाणीकी कुंडली में गुरु मंगल का दृष्‍टि संबंध इन्हें ऊर्जा से व आध्यात्मिकता से भरपूर रखता है। शुक्र-चंद्र कविता, लेखन में रूचि रखता हे.

अभी वर्तमान गोचरकी बात करे तो आडवाणीको केतु की महादशा चल रही हे. मई तक शुक्र और उसके बाद  सूर्य का अंतर प्रारंभ होगा। केतु में सुकर और सुरका अंतर उनके लिए लाभदाई रहेगा. उनकी राशिकुंडली में
गुरु और राहु दशम को पूर्ण दृष्‍टि लाभ दे रहे हैं। लग्न कुंडली में लाभभुवन में शनि भी फलदायी है। 
आडवाणीके लिए वर्तमान ग्रह स्थिति अनुकूल है जो उन्हें महत्वपूर्ण पद प्राप्ति में सहायता कर सकती है.

क्या कहते हे मायावती के सितारे

दलित मोर्चेकी नेत्री और मनुवादी (ब्राह्मणों) का हमेशा विरोध करनेवाली मायावती का जन्म 15 जनवरी 1956 को दौलतपुर में हुआ हे. मायावतीकी जन्मकुंडली में मकर लग्न हे और उनकी चन्द्र राशिः भी मकर हे. उनकी कुंडली में लग्न में सूर्य, चंद्र, बुध है. प्रथम भुवन (लग्न) पर शनिका प्रभाव हे. कुंडली में मंगल-शनि-राहु की युति बनती हे.

वर्तमान गोचर की बात करे तो अभी मायावती शनि की महादशा से गुजर रही हैं जिसमें चंद्र का अंतर 2010 तक है. लग्नेश में सप्तमेश की दशा विशेष फलदायी नहीं है. और अभी मकर राशिः में से गुरु का परिभ्रमण मकर लग्न वालो के लिए फलदायी नहीं हे. गोचर ग्रहों को देखते हुए मायावतीको पीएम बनने के लिए अभी कुछ और इंतजार करना पड़ेगा.

14 April, 2009

जन्मकुंडली के १२ भाव

जन्मकुंडली (लग्न कुंडली) में कुल १२ भाव होते हे. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार इस १२ भाव को अलग अलग नाम दिए गए हे। किस भाव से क्या देखा जाता हे यह जाने...

(१) लग्न याने की प्रथम भाव से शरीर, व्यक्तित्व, रंग-रूप, स्वभाव, चंचलता, यश देखा जाता हे.
(२) द्वितीय भाव से धन, कुटुंब, वाणी, नेत्र, मारक, विद्या, पारिवारिक स्थिति, राजदंड देखा जाता हे.
स्त्री की कुंडली में द्वितीय भाव से पति की आयु देखी जाती है।
(३) तृतीय भाव से भाई-बहन, पराक्रम, छोटी-छोटी यात्रा, लेखन, अनुसंधान स्त्री की कुंडली में पति का भाग्य, यश, श्वसुर, देवरानी, नंदोई।
(४) चतुर्थ भाव से माता, मातृभूमि संपत्ति, भवन, जमीन, जनता से संबंध, कुर्सी, श्वसुर का धन, पिता का व्यवसाय, अधिकार, सम्मान आदि।
(५) पंचम भाव से विद्या, संतान, मनोरंजन, प्रेम, मातृ धन, पति की आय, सास की मृत्यु, लाभ, जेठ, बड़सास, चाचा, श्वसुर, बुआ सास आदि।
(६) षष्ट भाव से श्रम, शत्रु, रोग, कर्ण, मामा, मौसी, पुत्रधन, प्रवास, श्वसुर की अचल संपत्ति, पति का शैया सुख।
(७) सप्तम भाव से पति, पत्नी, विवाह, दाम्पत्य जीवन, वैधव्य, चरित्र, नानी, पति का रंग-रूप, ससुराल, यश-सम्मान।
(८) अष्टम भाव से आयु, गुप्त धन, गुप्त रोग, सौभाग्य, यश-अपयश, पति का धन व परिवार।
(९) नवम भाव से भाग्य धर्म, यश, पुण्य, संतान, संन्यास, पौत्र, देवर-ननद।
(१०) दशम भाव से राज्य, प्रशासनिक  सेवा, पिता प्रतिष्ठा, सास, पति की मातृभूमि, आवास, अचल संपत्ति वाहनादि।
(११) एकादश भाव से आय, अभीष्ट प्राप्ति, चाचा, पुत्रवधू, दामाद, जेठानी, चाची, सास, सास का धन।
(१२) द्वादश भाव से व्यय, गुप्त शत्रु, हानि, शयन सुख, कारोबार, पति की हानि, ऋण, मामा, मामी।

शीघ्र विवाहके लिए उपाय

जन्म कुंडली में अशुभ ग्रहों के कारण कन्या के विवाह में विलंब हो या कुछ बाधा आ रही हो तो ये उपाय कन्या द्वारा करवाने से बाधा दूर होगी ।

(१) गुरुवार के दिन हल्दीयुक्त रोटियाँ बनाकर प्रत्येक रोटी पर गुड़ रखें व उसे गाय को खिलाएँ।
(२) 7 गुरुवार नियमित रूप से १ समय उपवास करे।
(३)  यहाँ दिए गए मंत्र का हररोज १०८ बार मंत्र जप करे ।
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नंद गोपसुतं देवि पतिं में कुरु ने नमः॥

इस उपाय से मनोकामना पूर्ण होगी और शीघ्र विवाह होगा ।

આર્ટ ઓફ લીવિંગનો મંત્રનાદ કાર્યક્રમ

સુરતમાં આર્ટ ઓફ લીવિંગ, શ્રી શ્રી રવિશંકર પ્રેરિત મંત્રનાદ કાર્યક્રમ હેઠળ નાના વરાછા ખાતે યોજાયેલ કાર્યક્રમમાં અંદાજે ૫૦ હજારની મેદની ઉમટી પડી હતી. મંત્રનાદના મુખ્ય વક્તા મહેશગિરિએ મેદનીમાં જણાવ્યું હતું કે, સંગગચ્છત્તમ લઇને અમે આવ્યા છીએ. ૨૬-૧૧- મુંબઇ આતંકવાદ બોમ્બ બ્લાસ્ટ પછી સમગ્ર  જનના મનમાં એક ડર પેસી ગયો છે. કોઇ પણ પક્ષ- આપણી સરકાર કોઇ પગલા લેતી નથી તો આવી સામાન્ય જનતાનો આર્તનાદ અવાજ સાંભળી અમે સમગ્ર દેશમાં આ મંત્રનાદનો કાર્યક્રમ કરી રહ્યા છે. આના પહેલા દિલ્હી, મુંબઈ જેવા શહેરોમાં થઇ ચૂક્યો છે અને સમગ્ર ગુજરાત, મધ્યપ્રદેશ, ઉત્તરપ્રદેશ દરેક જગ્યાએ થઇ રહ્યા છે. આના માટે અમારા આર્ટ ઓફ લીવિંગના દરેક ટીચર્સ, સ્વયંસેવકો યુવાચાર્ય લોકોમાં જન જાગૃતિ લાવવાના આ અભિયાનમાં જોડાઇને ખૂબ સુંદર કાર્ય કરી રહ્યા છે. સામાન્ય રીતે એકબીજાની સામે આંગળી ચીંધવા કરતા એકબીજાની આંગળી પકડીને સાથે ચાલીએ અને હવે દરેક જનતાએ સ્વયં જાગૃતિ લાવવી જ પડશે. ભારતના પ્રશ્નોનું નિરાકરણ આધ્યાત્મ ગુરુઓ દ્વારા થાય તેવી પણ જનતાને અપીલ કરવા આવ્યા છીએ. ભૂતકાળમાં ભગવાનશ્રી રામના ગુરુ વશિષ્ટ અને ભગવાનશ્રી કૃષ્ણએ અર્જુનના ઉપર હાથ રાખ્યો હતો. જેથી સાથે સાથે આપણા દેશના સાધુ-સંત મહાત્માને બદનામ ન થાય તેવી પણ અપીલ કરીએ છીએ.

  • મંત્રનાદના પ્રવક્તા મહેશગિરિજીએ જે સરકાર ધર્મને લઇને ચાલે તેને ચૂંટવાની અપીલ કરી

હવે આપણે આપણા ધર્મ, જાતિ, ન્યાત દરેક વસ્તુ ભૂલી જઇને બસ એક જ વસ્તુ યાદ રાખીએ કે આપણે સાથે ચાલીએ. જે રાજકીય પક્ષ- સરકાર ધર્મ અધ્યાત્મને સાથે રાખીને ચાલે એમને ચૂંટીએ. 

હજ્જારો લોકો પાસે પ્રતિજ્ઞાા લેવડાવાઈ...

  • હું ભ્રષ્ટ્રાચારને સમર્થન નહીં કરું.
  • હું આતંકવાદને સહન નહીં કરું અને સમર્થન પણ નહીં આપું.
  • હું કન્યા ભ્રુણહત્યાનું સમર્થન નહીં કરું.
  • હું મારા દેશને મજબુત બનાવવા ક્યારેય વ્યસન નહીં કરું.
  • હું મારા ઘરની આસપાસના વિસ્તારને તથા શહેરને સ્વચ્છ રાખીશ.
  • હું મારા શહેરના ટ્રાફિક નિમયોનું પાલન કરીશ,  હું જળસંચય તથા પર્યાવરણની સુરક્ષા કરીશ, હું મતદાન અવશ્ય કરીશ.

11 April, 2009

The power of your Vote

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India's problems are complex. And unfortunately these are compounded by vote-bank politics. Instead of uniting the different sections of society, many politicians divide it to keep their vote banks intact. If people are united, politicians won't be able to get votes through divisive politics. In such a situation, the only way for them to win votes would be through good performance. As citizens, we must protect our country from those who manipulate issues for their personal gains and who lead by playing vote-bank politics. Those with vested interests support insensible decisions and oppose sensible ones. We have to steer clear of such leaders. We must encourage broad-minded politicians and leaders to come forward and take charge, and to educate and uplift the society - spiritually, morally and socially. We need leaders who are satya-darshi (truthful), sam-darshi (equanimous), priya-darshi (pleasant), paar-darshi (transparent) and door-darshi (visionary). So, before we elect our leaders, we should examine their qualifications. We must elect leaders who will do away with policies based on caste, creed, religion and region; who will ensure that every child gets a multi-cultural, multi-dimensional education.

We need leadership with a mission and a vision, leadership with a spirit of sacrifice, compassion and commitment. We must choose leaders who have a long-term vision and short-term plans to achieve it. They should have great personal integrity, and place the country before themselves. Unfortunately, most of our politicians lack a sense of sacrifice and inclusiveness. Irrespective of the party they belong to, people perceive politicians as insincere. Today, people are fed up of them. This is when apathy sets in among people. They dismiss politics as a whole and withdraw from their basic duty of voting. Our votes are an important tool to bring about a change in the system; they give us an opportunity to raise our voice against injustice. But many of us have developed a chalta hai attitude, because we fail to see the power of our votes. This attitude is dangerous for the country. By not voting we are encouraging the status quo.

Each one of us must not only vote but also encourage others around us to vote. When good, intelligent and well-educated people don't vote, they play into the hands of politicians, who use money and vote bank politics to seize power. People should not lose hope. Good politicians exist. And they must be given a chance to do the best they can for the country, for its people. We have seen the shortcomings of capitalism, communism and socialism. Now is the time for humanism and spiritualism. Politics without humanism and spiritualism is bound to be dirty. Many people believe that spiritualism is not for this world, that it is not a practical tool to bring about societal transformation. But that's a misconception. Mahatma Gandhi was spiritual. He conducted satsangs every day and played an important role in bringing freedom for our country. That is why today we need leaders who have a spirit of sacrifice, and who are spiritual in their outlook, to enter politics.

- by Sri Sri Ravishankar
(source: www.srisri.org)

10 April, 2009

Quotes of Sri Raman Maharshi

  • There is no greater mystery than this, that being the reality yourself, you seek to gain reality.
  • You think there is something binding your reality and that something must be destroyed before the reality is freed. This is ridiculous.
  • A day will dawn when you will laugh at all your efforts. What is there to realize? The real is always as it is.
  • You have realized the unreal, in other words, you regard the unreal as that which is real. Give up this attitude and you will attain wisdom.
  • There is nothing new nor anything you do not already have which needs to be gained. The feeling that you have not yet realized is the sole obstruction to realization.
  • In fact, you are already free. If it were not so, the realization would be new. If it has not existed so far, it must take place hereafter. What comes will also go, what can be gained can also be lost.
  • If realization is not eternal it is not worth having. Therefore what you seek is not that which must happen afresh. It is only that which is eternal, but not now known due to obstruction.
  • Remove the obstruction. That which is eternal is not known to be so because of ignorance. Ignorance is the obstruction. Get over the ignorance and all will be well.
  • The ignorance is identical with the 'I-thought'. Find its source and it will vanish. Then the Self alone will shine as it always has, in the stillness of being.

About Sri Raman Maharshi

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Sri Ramana Maharshi was probably the most famous Indian sage of the twentieth century. He was renowned for his saintly life, for the fullness of his self-realization, and for the feelings of deep peace that visitors experienced in his presence. So many people came to see him at the holy hill of Arunchala where he spent his adult life that an ashram had to be built around him. He answered questions for hours every day, but never considered himself to be anyone's guru.

He was born on December 30, 1879 in a village called Tirucculi about 30 miles south of Madurai in southern India. His middle-class parents named him Venkataraman. His father died when he was twelve, and he went to live with his uncle in Madurai, where he attended American Mission High School.

At age 16, he became spontaneously self-realized. Six weeks later he ran away to the holy hill of Arunachala where he would remain for the rest of his life. For several years he stopped talking and spent many hours each day in samadhi. When he began speaking again, people came to ask him questions, and he soon acquired a reputation as a sage. In 1907, when he was 28, one of his early devotees named him Bhagavan Sri Ramana Maharshi, Divine Eminent Ramana the Great Seer, and the name stuck. Eventually he became world-famous and an ashram was built around him. He died of cancer in 1950 at the age of 70.

His Self-Realization :

At age 16, he heard somebody mention "Arunachala." Although he didn't know what the word meant (it's the name of a holy hill associated with the god Shiva) he became greatly excited. At about the same time he came across a copy of Sekkilar's Periyapuranam, a book that describes the lives of Shaivite saints, and became fascinated by it. In the middle of 1896, at age 16, he was suddenly overcome by the feeling that he was about to die. He lay down on the floor, made his body stiff, and held his breath. "My body is dead now," he said to himself, "but I am still alive." In a flood of spiritual awareness he realized he was spirit, not his body.

His Guru :

Ramana Maharshi didn't have a human guru (other than himself). He often said that his guru was Arunachala, a holy mountain in South India.

His Teachings :

Ramana Maharshi taught a method called self-inquiry in which the seeker focuses continuous attention on the I-thought in order to find its source. In the beginning this requires effort, but eventually something deeper than the ego takes over and the mind dissolves in the heart center. For more information, see our page on Self-Inquiry.

(Source: www.realization.org/page/topics/ramana.htm)

Atma Bodha

1. I am composing the ATMA-BODHA, this treatise of the Knowledge of the Self, for those who have purified themselves by austerities and are peaceful in heart and calm, who are free from cravings and are desirous of liberation.

2. Just as the fire is the direct cause for cooking, so without Knowledge no emancipation can be had. Compared with all other forms of discipline Knowledge of the Self is the one direct means for liberation.

3. Action cannot destroy ignorance, for it is not in conflict with or opposed to ignorance. Knowledge does verily destroy ignorance as light destroys deep darkness.

4. The Soul appears to be finite because of ignorance. When ignorance is destroyed the Self which does not admit of any multiplicity truly reveals itself by itself: like the Sun when the clouds pass away.

5. Constant practice of knowledge purifies the Self ('Jivatman'), stained by ignorance and then disappears itself – as the powder of the 'Kataka-nut' settles down after it has cleansed the muddy water.

6. The world which is full of attachments, aversions, etc., is like a dream. It appears to be real, as long as it continues but appears to be unreal when one is awake (i.e., when true wisdom dawns).

7. The Jagat appears to be true (Satyam) so long as Brahman, the substratum, the basis of all this creation, is not realised. It is like the illusion of silver in the mother-of pearl.

8. Like bubbles in the water, the worlds rise, exist and dissolve in the Supreme Self, which is the material cause and the prop of everything.

9. All the manifested world of things and beings are projected by imagination upon the substratum which is the Eternal All-pervading Vishnu, whose nature is Existence-Intelligence; just as the different ornaments are all made out of the same gold.

10. The All-pervading Akasa appears to be diverse on account of its association with various conditionings (Upadhis) which are different from each other. Space becomes one on the destruction of these limiting adjuncts: So also the Omnipresent Truth appears to be diverse on account of Its association with the various Upadhis and becomes one on the destruction of these Upadhis.

11. Because of Its association with different conditionings (Upadhis) such ideas as caste, colour and position are super-imposed upon the Atman, as flavour, colour, etc., are super-imposed on water.

12. Determined for each individual by his own past actions and made up of the Five elements – that have gone through the process of "five-fold self-division and mutual combination" (Pancheekarana) – are born the gross-body, the medium through which pleasure and pain are experienced, the tent-of-experiences.

13. The five Pranas, the ten organs and the Manas and the Buddhi, formed from the rudimentary elements (Tanmatras) before their "five-fold division and mutual combination with one another" (Pancheekarana) and this is the subtle body, the instruments-of-experience (of the individual).

14. Avidya which is indescribable and beginningless is the Causal Body. Know for certain that the Atman is other than these three conditioning bodies (Upadhis).

15. In its identification with the five-sheaths the Immaculate Atman appears to have borrowed their qualities upon Itself; as in the case of a crystal which appears to gather unto itself colour of its vicinity (blue cloth, etc.,).

16. Through discriminative self-analysis and logical thinking one should separate the Pure self within from the sheaths as one separates the rice from the husk, bran, etc., that are covering it.

17. The Atman does not shine in everything although He is All-pervading. He is manifest only in the inner equipment, the intellect (Buddhi): just as the reflection in a clean mirror.

18. One should understand that the Atman is always like the King, distinct from the body, senses, mind and intellect, all of which constitute the matter (Prakriti); and is the witness of their functions.

19. The moon appears to be running when the clouds move in the sky. Likewise to the non-discriminating person the Atman appears to be active when It is observed through the functions of the sense-organs.

20. Depending upon the energy of vitality of Consciousness (Atma Chaitanya) the body, senses, mind and intellect engage themselves in their respective activities, just as men work depending upon the light of the Sun.

21. Fools, because they lack in their powers of discrimination superimpose on the Atman, the Absolute-Existence-Knowledge (Sat-Chit), all the varied functions of the body and the senses, just as they attribute blue colour and the like to the sky.

22. The tremblings that belong to the waters are attributed through ignorance to the reflected moon dancing on it: likewise agency of action, of enjoyment and of other limitations (which really belong to the mind) are delusively understood as the nature of the Self (Atman).

23. Attachment, desire, pleasure, pain, etc., are perceived to exist so long as Buddhi or mind functions. They are not perceived in deep sleep when the mind ceases to exist. Therefore they belong to the mind alone and not to the Atman.

24. Just as luminosity is the nature of the Sun, coolness of water and heat of fire, so too the nature of the Atman is Eternity, Purity, Reality, Consciousness and Bliss.

25. By the indiscriminate blending of the two – the Existence-Knowledge-aspect of the Self and the thought-wave of the intellect – there arises the notion of "I know".

26. Atman never does anything and the intellect of its own accord has no capacity to experience 'I know'. But the individuality in us delusorily thinks he is himself the seer and the knower.

27. Just as the person who regards a rope as a snake is overcome by fear, so also one considering oneself as the ego (Jiva) is overcome by fear. The ego-centric individuality in us regains fearlessness by realising that It is not a Jiva but is Itself the Supreme Soul.

28. Just as a lamp illumines a jar or a pot, so also the Atman illumines the mind and the sense organs, etc. These material-objects by themselves cannot illumine themselves because they are inert.

29. A lighted-lamp does not need another lamp to illumine its light. So too, Atman which is Knowledge itself needs no other knowledge to know it.

30. By a process of negation of the conditionings (Upadhis) through the help of the scriptural statement 'It is not this, It is not this', the oneness of the individual soul and the Supreme Soul, as indicated by the great Mahavakyas, has to be realised.

31. The body, etc., up to the "Causal Body" – Ignorance – which are objects perceived, are as perishable as bubbles. Realise through discrimination that I am the 'Pure Brahman' ever completely separate from all these.

32. I am other than the body and so I am free from changes such as birth, wrinkling, senility, death, etc. I have nothing to do with the sense objects such as sound and taste, for I am without the sense-organs.

33. I am other than the mind and hence, I am free from sorrow, attachment, malice and fear, for "HE is without breath and without mind, Pure, etc.", is the Commandment of the great scripture, the Upanishads.

34. I am without attributes and actions; Eternal (Nitya) without any desire and thought (Nirvikalpa), without any dirt (Niranjana), without any change (Nirvikara), without form (Nirakara), ever-liberated (Nitya Mukta) ever-pure (Nirmala).

35. Like the space I fill all things within and without. Changeless and the same in all, at all times I am pure, unattached, stainless and motionless.

36. I am verily that Supreme Brahman alone which is Eternal, Pure and Free, One, indivisible and non-dual and of the nature of Changeless-Knowledge-Infinite.

37. The impression "I am Brahman" thus created by constant practice destroys ignorance and the agitation caused by it, just as medicine or Rasayana destroys disease.

38. Sitting in a solitary place, freeing the mind from desires and controlling the senses, meditate with unswerving attention on the Atman which is One without-a-second.

39. The wise one should intelligently merge the entire world-of-objects in the Atman alone and constantly think of the Self ever as contaminated by anything as the sky.

40. He who has realised the Supreme, discards all his identification with the objects of names and forms. (Thereafter) he dwells as an embodiment of the Infinite Consciousness and Bliss. He becomes the Self.

41. There are no distinctions such as "Knower", the "Knowledge" and the "Object of Knowledge" in the Supreme Self. On account of Its being of the nature of endless Bliss, It does not admit of such distinctions within Itself. It alone shines by Itself.

42. When this the lower and the higher aspects of the Self are well churned together, the fire of knowledge is born from it, which in its mighty conflagration shall burn down all the fuel of ignorance in us.

43. The Lord of the early dawn (Aruna) himself has already looted away the thick darkness, when soon the sun rises. The Divine Consciousness of the Self rises when the right knowledge has already killed the darkness in the bosom.

44. Atman is an ever-present Reality. Yet, because of ignorance it is not realised. On the destruction of ignorance Atman is realised. It is like the missing ornament of one's neck.

45. Brahman appears to be a 'Jiva' because of ignorance, just as a post appears to be a ghost. The ego-centric-individuality is destroyed when the real nature of the 'Jiva' is realised as the Self.

46. The ignorance characterised by the notions 'I' and 'Mine' is destroyed by the knowledge produced by the realisation of the true nature of the Self, just as right information removes the wrong notion about the directions.

47. The Yogi of perfect realisation and enlightenment sees through his "eye of wisdom" (Gyana Chakshush) the entire universe in his own Self and regards everything else as his own Self and nothing else.

48. Nothing whatever exists other than the Atman: the tangible universe is verily Atman. As pots and jars are verily made of clay and cannot be said to be anything but clay, so too, to the enlightened soul and that is perceived is the Self.

49. A liberated one, endowed with Self-knowledge, gives up the traits of his previously explained equipments (Upadhis) and because of his nature of Sat-chit-ananda, he verily becomes Brahman like (the worm that grows to be) a wasp.

50. After crossing the ocean of delusion and killing the monsters of likes and dislikes, the Yogi who is united with peace dwells in the glory of his own realised Self – as an Atmaram.

51. The self-abiding Jivan Mukta, relinquishing all his attachments to the illusory external happiness and satisfied with the bliss derived from the Atman, shines inwardly like a lamp placed inside a jar.

52. Though he lives in the conditionings (Upadhis), he, the contemplative one, remains ever unconcerned with anything or he may move about like the wind, perfectly unattached.

53. On the destruction of the Upadhis, the contemplative one is totally absorbed in 'Vishnu', the All-pervading Spirit, like water into water, space into space and light into light.

54. Realise That to be Brahman, the attainment of which leaves nothing more to be attained, the blessedness of which leaves no other blessing to be desired and the knowledge of which leaves nothing more to be known.

55. Realise that to be Brahman which, when seen, leaves nothing more to be seen, which having become one is not born again in this world and which, when knowing leaves nothing else to be known.

56. Realise that to be Brahman which is Existence-Knowledge-Bliss-Absolute, which is Non-dual, Infinite, Eternal and One and which fills all the quarters – above and below and all that exists between.

57. Realise that to be Brahman which is Non-dual, Indivisible, One and Blissful and which is indicated in Vedanta as the Immutable Substratum, realised after the negation of all tangible objects.

58. Deities like Brahma and others taste only a particle, of the unlimited Bliss of Brahman and enjoy in proportion their share of that particle.

59. All objects are pervaded by Brahman. All actions are possible because of Brahman: therefore Brahman permeates everything as butter permeates milk.

60. Realise that to be Brahman which is neither subtle nor gross: neither short nor long: without birth or change: without form, qualities, colour and name.

61. That by the light of which the luminous, orbs like the Sun and the Moon are illuminated, but which is not illumined by their light, realise that to be Brahman.

62. Pervading the entire universe outwardly and inwardly the Supreme Brahman shines of Itself like the fire that permeates a red-hot iron-ball and glows by itself.

63. Brahman is other than this, the universe. There exists nothing that is not Brahman. If any object other than Brahman appears to exist, it is unreal like the mirage.

64. All that is perceived, or heard, is Brahman and nothing else. Attaining the knowledge of the Reality, one sees the Universe as the non-dual Brahman, Existence-Knowledge-Bliss-Absolute.

65. Though Atman is Pure Consciousness and ever present everywhere, yet It is perceived by the eye-of-wisdom alone: but one whose vision is obscured by ignorance he does not see It; as the blind do not see the resplendent Sun.

66. The 'Jiva' free from impurities, being heated in the fire of knowledge kindled by hearing and so on, shines of itself like gold.

67. The Atman, the Sun of Knowledge that rises in the sky of the heart, destroys the darkness of the ignorance, pervades and sustains all and shines and makes everything to shine.

68. He who renouncing all activities, who is free of all the limitations of time, space and direction, worships his own Atman which is present everywhere, which is the destroyer of heat and cold, which is Bliss-Eternal and stainless, becomes All-knowing and All-pervading and attains thereafter Immortality.

- By Adi Sankaracharya
Translated by Swami Chinmayananda

09 April, 2009

Sadhana Panchakam

(1) Study the Vedas daily.
Perform diligently the duties (karmas) ordained by them.
Dedicate all those actions (karmas) as worship unto the Lord.
Renounce all desires in the mind.
Wash away the hoards of sins in the bosom.
Recognise that the pleasures of sense-objects (samsar) are riddled with pain.
Seek the Self with consistent endeavour.
Escape from the bondage of 'home'.

(2) Seek companionship with Men of Wisdom.
Be established in firm devotion to the Lord.
Cultivate the virtues such as Shanti etc.,
Eschew all desire-ridden actions.
Take shelter at a Perfect Master (Sat-Guru).
Everyday serve His Lotus feet.
Worship "Om" the Immutable.
Listen in depth, the Upanishadic declarations.

(3) Reflect ever upon the meaning of the Upanishadic commandments, and take refuge in the Truth of Brahman. Avoid perverse arguments but follow the discriminative rationale of the Sruti (Upanishads).
Always be absorbed in the attitude (bhav) – "I am Brahman".
Renounce pride.
Give up the delusory misconception – "I am the body".
Give up totally the tendency to argue with wise men.

(4) In hunger diseases get treated.
Daily take the medicine of Bhiksha-food.
Beg no delicious food. Live contentedly upon whatever comes to your lot as ordained by Him.
Endure all the pairs of opposites: heat and cold, and the like.
Avoid wasteful talks.
Be indifferent.
Save yourself from the meshes of other peoples' kindness.

(5) In solitude live joyously.
Quieten your mind in the Supreme Lord.
Realise and see the All-pervading Self every where.
Recognise that the finite Universe is a projection of the Self.
Conquer the effects of the deeds done in earlier lives by the present right action.

Through wisdom become detached from future actions (Agami).
Experience and exhaust "Prarabdha" the fruits of past actions.
Thereafter, live absorbed in the bhav - "I am Brahman" !

- By Adi Sankaracharya
Translated by Swami Chinmayananda

Nirvana Shatkam

Mano budhyahankara chithaa ninaham,
Na cha srothra jihwe na cha graana nethrer,
Na cha vyoma bhoomir na thejo na vayu,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.


Neither am I mind, nor intelligence ,
Nor ego, nor thought,
Nor am I ears or the tongue or the nose or the eyes,
Nor am I earth or sky or air or the light,
I am Shiva, I am Shiva, of nature knowledge and bliss.
Na cha praana sangno na vai pancha vaayuh,
Na vaa saptha dhathur na va pancha kosa,
Na vak pani padam na chopastha payu,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.


Neither am I the movement due to life,
Nor am I the five airs, nor am I the seven elements,
Nor am I the five internal organs,
Nor am I voice or hands or feet or other organs,
I am Shiva, I am Shiva, of nature knowledge and bliss

Na me dwesha raghou na me lobha mohou,
Madho naiva me naiva matsarya bhava,
Na dharmo na cha artha na kamo na moksha,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.


I never do have enmity or friendship,
Neither do I have vigour nor feeling of competition,
Neither do I have assets, or money or passion or salvation,
I am Shiva, I am Shiva, of nature knowledge and bliss

Na punyam na paapam na soukhyam na dukham,
Na manthro na theertham na veda na yagna,
Aham bhojanam naiva bhojyam na bhoktha,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.


Never do I have good deeds or sins or pleasure or sorrow,
Neither do I have holy chants or holy water or holy books or fire sacrifice,
I am neither food or the consumer who consumes food,
I am Shiva, I am Shiva, of nature knowledge and bliss

Na mruthyur na sankha na me jathi bhedha,
Pitha naiva me naiva matha na janma,
Na bhandhur na mithram gurur naiva sishyah,
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.


I do not have death or doubts or distinction of caste,
I do not have either father or mother or even birth,
And I do not have relations or friends or teacher or students,
I am Shiva, I am Shiva, of nature knowledge and bliss

Aham nirvi kalpo nirakara roopo,
Vibhuthwascha sarvathra sarvendriyanaam,
Na chaa sangatham naiva mukthir na meyah
Chidananada Roopa Shivoham, Shivoham.


I am one without doubts , I am without form,
Due to knowledge I do not have any relation with my organs,
And I am always redeemed,
I am Shiva, I am Shiva, of nature knowledge and bliss.

- By Adi Sankaracharya
Translated by P. R. Ramachander

Shiv Manas Pooja

Aaradhayami mani sannibham athma lingam,
Maayapuri hrudaya pankaja sannivishtam,
Sradha nadhi vimala chitha jalabishegai,
Nithyam samadhi kusmaira punarbhavai.

I worship that Linga,
Which is in me as my soul,
Residing in the illusory lotus of my heart,
Getting bathed by the clear water,
Of the river of my devotion,
And worshipped daily by the Lotus,
Of my meditation for avoiding another birth.


Rathnai Kalpitham asanam, Himajalai snanam cha divyambaram,
Naana rathna vibhooshitham mruga madha modhanvitham Chandanam,
Jathi champaka bilwa pathra rachitham, pushpam cha deepam Thada,
Deepam deva dayanithe pasupathe, hrud kalpyatham gruhyatham.

I offer you an imaginary throne made of precious jewels,
I offer you bath in the water of melted snow from the Himalayas,
I offer you holy silken cloth to wear,
I adorn you with very many precious jewels,
I offer you musk and sandal,
I offer you Bilwa and Champaka flowers,
And I offer you the holy lamp,
But all these I offer in the portal of my mind,
Please God who is merciful and who is the Lord of all beings,
Accept my offerings and bless me.

Souvarne nava rathna Ganda Rachithe, pathre Grutham Payasam,
Bakshyam pancha vidam Payo dadhiyutham, rambha phalam panakam,
Saaka namayutham jalam ruchikaram, karpoora gandojwalam,
Thamboolam manasa maya virachitham Bhakthyo prabho sweekuru

I offer you Ghee and the sweet payasam in golden vessel ,
Decorated with nine type of precious gems,
I offer you five different dishes made of curd and milk,
I offer you panakam made of sweet fruits,
I offer you tasty sweet scented water to drink,
I offer you the lamp made of camphor along with tinkling bells,
And I offer you betel leaf and nut,
But these are offered by my mind with utter devotion to you,
So Lord Kindly accept and bless.

Chathram Chamarayoryugam vyajanagam, chaa darshakam nirmalam,
Veena bheri mrudanga kahala kala geetha nruthyam thada,
Sasthangam pranthi sthuthir bahu vidha, hyethat samastham maya,
Sankalpena samapitham thava vibho , poojam gruhana prabho.

I offer you a pretty stage,
I offer you couple of decorative fans,
I also offer you shining mirror,
I offer you Veena, kettledrums, Mrudanga and a very big drum,
I offer you song and dance,
I offer you full prostration,
I offer you several types of prayers,
But all these I offer you my Lord, in my mind
So Lord kindly accept this my worship.

Aathma thwam Girija Mathi sahacharaa, prana sarreram gruham,
Pooja theey vishayopa bhoga rachana, nidhra samadhi sthithi,
Sanchara padayo pradakshina vidhi, , sthothrani sarva giraa,
Yadyath karma karomi thathad akhilam, shambho thavaradhanam.

My soul is your temple my lord,
My activities are thine attendants,
My body is thine home,
My acts to please my senses are thine worship,
My act of sleep is the deep meditation on thee,
All my walks with my feet are thine perambulations,
What ever falls from my mouth are thine prayers,
Oh Lord, everything I say and do are thine forms of worship.

Kara charana krutham vaak kayajam karmajam vaa,
Sravana nayanajam vaa maanasam vaa aparadham,
Vihithamavihitham vaa sarva methath Kshamaswa,
Jaya Jaya katunabdhe sri Mahadeva Shambho.

Please pardon Oh lord
All those acts committed by me,
By hands, by action, by body or
By hearing, by my sight, or by my mind,
Whether they are proper or improper..
Victory oh victory, Oh, ocean of mercy,
Oh, The greatest of Gods and Oh benevolent one.

Matha cha Parvathy Devi,
Pitha devo Maheswara,
Bandhava Shiva Bakthamscha,
Swadeso Bhuvana thrayam

My mother is the goddess Parvathy,
My father is the Lord Shiva,
My friends are the devotees of Shiva
And my native place is all the three worlds.


- By Adi Sankaracharya
Translated by P. R. Ramachander

आतंक का कारण आंतरिक पशुता: ओशो

दुनिया भर में बढ़ रहे आतंकवाद और हिंसा के बारे में पिछली शताब्दी के बेहद चर्चित दार्शनिक एवं आध्यात्मिक शख्सियत ओशो रजनीश का मानना है कि आतंकवाद का मूल कारण मनुष्य के मन में पल रहे स्वार्थ और लोभ जैसी पशुताएँ हैं और इनको दूर किए बिना इस विश्वव्यापी समस्या का निराकरण नहीं है।

ओशो का मानना था कि यदि मनुष्य में ध्यान के जरिए प्रेम और करुणा के फूल खिलाए जाएँ तो मानव के अवचेतन में छिपी हिंसा को दूर किया जा सकता है। इसी के साथ वह उत्सव प्रियता पर भी बहुत जोर देते हैं, क्योंकि उनके अनुसार धर्मों ने मनुष्य से उसकी उत्सव प्रियता को छीन लिया है।



ओशो वर्ल्ड पत्रिका के वरिष्ठ संपादक चैतन्य कीर्ति ने आतंकवाद पर ओशो के विचारों की चर्चा करते हुए कहा कि उनका मानना है कि आज समाज में हिंसा और आतंक इसलिए बढ़ गया है क्योंकि आदमी होश में नहीं जी रहा है। आदमी पशु है क्योंकि वह स्वार्थ और लोभ की भावना से प्रेरित होकर अन्य मनुष्य पर आक्रमण करने में संकोच नहीं करता।

उन्होंने कहा कि पशु का अर्थ है पाश यानी स्वार्थ से बंधा व्यक्ति। ओशो कहा आतंकवाद बमों में नहीं, किसी के हाथों में नहीं वह तुम्हारे अवचेतन में हैं यदि इसका उपाय नहीं किया गया तो हालत बद से बदतर हो जाएँगे।

विभिन्न धर्मों में बढ़ती कट्टरता के बारे में ओशो के विचार पूछने पर स्वामी चैतन्य कीर्ति ने कहा कि ओशो ने जीवन भर पंडित, मुल्ला, मौलवियों और पादरियों का कठोर विरोध किया था क्योंकि वे सब धर्म की एक खास व्याख्या पर जोर देते हैं। ओशो कहा करते थे कि विभिन्न भगवानों के बीच कोई लड़ाई नहीं है, लेकिन उनके अनुयायियों के बीच लड़ाई ही लड़ाई है।

नव संन्यास, डायनेमिक मेडिटेशन और संभोग से समाधि तक जैसी कई अवधारणाएँ देने वाले ओशो अपनी तमाम प्रखर बौद्धिक क्षमताओं के बावजूद जीवन भर विवादों के घेरे में रहे। विवादों के बावजूद उनके जीवन काल में दुनिया भर में उनके अनुयायियों की संख्या लगातार बढ़ती रही।

दिलचस्प है कि ओशो की शख्सियत पूरी तरह बौद्धिक थी लेकिन उनके विरोधी उनके निजी बिन्दुओं पर जीवन भर उनका विरोध करते थे। तमाम व्यक्ति ही नहीं दुनिया की महाशक्ति अमेरिका की सरकार भी एक समय उनकी विरोधी हो गई और उन्हें अंतत: देश से निर्वासित करके ही दम लिया।

यही नहीं ओशो ने जब अन्य देशों से शरण माँगी तो दुनिया के 21 राष्ट्रों ने उन्हें पनाह देने से इनकार कर दिया।

08 April, 2009

आप के झोले में क्या हे ?

अमावस की संध्या थी। सूर्य पश्चिम में ढल रहा था आर शीघ्र ही रात्रि का अंधकार उतर आने को था। एक वृद्ध संन्यासी अपने युवा शिष्य के साथ वन से निकलते थे। अंधेरे को उतरते देख उन्होंने युवक से पूछा, ''रात्रि होने को है, बीहड़ वन है। आगे मार्ग में कोई भय तो नहीं है?''

इस प्रश्न को सुन युवा संन्यासी बहुत हैरान हुआ। संन्यासी को भय कैसा? भय बाहर तो होता नहीं, उसकी जड़े तो निश्चय ही कहीं भीतर होती हैं!

संध्या ढले, वृद्ध संन्यासी ने अपना झोला युवक को दिया और वे शौच को चले गये। झोला देते समय भी वे चिंतित और भयभीत मालूम हो रहे थे।

उनके जाते ही युवक ने झोला देखा, तो उसमें एक सोने की ईट थी! उसकी समस्या समाप्त हो गयी। उसे भय का कारण मिल गया था। वृद्ध ने आते ही शीघ्र झोला अपने हाथ में ले लिया और उन्होंने पुन: यात्रा आरंभ कर दी। रात्रि जब और सघन हो गई और निर्जन वन-पथ पर अंधकार ही अंधकार शेष रह गया, तो वृद्ध ने पुन: वही प्रश्न पूछा। उसे सुनकर युवक हंसने लगा और बोला, ''आप अब निर्भय हो जावें। हम भय के बाहर हो गये हैं।'' वृद्ध ने साश्चर्य युवक को देखा और कहा, ''अभी वन कहां समाप्त हुआ है?'' युवक ने कहा, ''वन तो नहीं भय समाप्त हो गया है। उसे मैं पीछे कुएं मैं फेंक आया हूं।'' यह सुन वृद्ध ने घबराकर अपना झोला देखा। वहां तो सोने की जगह पत्थर की ईट रखी थी। एक क्षण को तो उसे अपने हृदय की गति ही बंद होती प्रतीत हुई। लेकिन, दूसरे ही क्षण वह जाग गया और वह अमावस की रात्रि उसके लिए पूर्णिमा की रात्रि बन गयी। आंखों में आ गए इस आलोक से आनंदित हो, वह नाचने लगा। एक अद्भुत सत्य का उसे दर्शन हो गया था। उस रात्रि फिर वे उसी वन में सो गये थे। लेकिन, अब वहां न तो अंधकार था, न ही भय था!

बाहर की संपत्ति जितनी बढ़ती है, उतना ही भय बढ़ता जाता है- जब कि लोग भय को मिटाने को ही बाहर की संपत्ति के पीछे दौड़ते हैं! काश! उन्हें ज्ञात हो सके कि एक और संपदा भी है, जो कि प्रत्येक के भीतर है। और, जो उसे जान लेता है, वह अभय हो जाता है।

वह संपत्ति जो बाह्य संग्रह से उपलब्ध होती है, वस्तुत: संपत्ति नहीं है, अच्छा हो कि उसे विपत्ति ही कहें! वास्तविक संपत्ति तो स्वयं को उघाड़ने से ही प्राप्त होती है। जिससे भय आवे, वह विपत्ति है- और जिससे अभय, उसे ही मैं संपत्ति कहता हूं।

आप भी देखे आप के झोले में क्या हे ??!!


06 April, 2009

यह संसार तुम्हारा दर्पण है

एक अजनबी किसी गांव में पहुंचा। उसने उस गांव के प्रवेश द्वार पर बैठे एक वृद्ध से पूछा, ''क्या इस गांव के लोग अच्छे और मैत्रिपूर्ण हैं?'' उस वृद्ध ने सीधे उत्तर देने की बजाय स्वयं ही उस अजनबी से प्रश्न किया, ''मित्र, जहां से तुम आते हो वहां के लोग कैसे हैं?

'' अजनबी दुखी और क्रुद्ध हो कर बोला, ''अत्यंत क्रूर, दुष्ट और अन्यायी। मेरी सारी विपदाओं के लिए उनके अतिरिक्त और कोई जिम्मेवार नहीं। लेकिन आप यह क्यों पूछ रहे हैं?'' वृद्ध थोड़ी देर चुप रहा और बोला, ''मित्र, मैं दुखी हूं। यहां के लोग भी वैसे ही हैं। तुम उन्हें भी वैसा ही पाओगे।''

वह व्यक्ति जा भी नहीं पाया था कि एक दूसरे राहगीर ने उस वृद्ध से आकर पुन: वही बात पूछी, ''यहां के लोग कैसे हैं?'' वह वृद्ध बोला, ''मित्र क्या पहले तुम बता सकोगे कि जहां से आते हो, वहां के लो कैसे हैं?'' इस प्रश्न को सुन यह व्यक्ति आनंदपूर्ण स्मृतियों से भर गया। और उसकी आंखें खुशी के आंसुओं से गीली हो गई। वह बोलने लगा, ''आह, बहुत प्रेमपूर्ण और बहुत दयालू, मेरी सारी खुशियों के कारण वे ही थे। काश, मुझे उन्हें कभी भी न छोड़ना पड़ता!'' वह वृद्ध बोला,''मित्र, यहां के लोग भी बहुत प्रेमपूर्ण हैं, इन्हें तुम उनसे कम दयालु नहीं पाओगे, ये भी उन जैसे ही हैं। मनुष्य-मनुष्य में बहुत भेद नहीं है।''
संसार दर्पण है। हम दूसरों में जो देखते हैं, वह अपनी ही प्रतिक्रिया होती है। जब तक सभी में शिव और सुंदर के दर्शन न होने लगें, तब तक जानना चाहिए कि स्वयं में ही कोई खोट शेष रह गई है।

04 April, 2009

'मैं' को छोड़ना ही सन्यास हे

एक राजा ने परमात्मा को खोजना चाहा। वह किसी आश्रम में गया। उस आश्रम के प्रधान साधु ने कहा, ''जो तुम्हारे पास है, उसे छोड़ दो। परमात्मा को पाना तो बहुत सरल है।'' वह राजा सब कुछ छोड़ कर पहुंचा। उसने राज्य का परित्याग कर दिया और सारी संपत्ति दरिद्रों को बांट दी। वह बिलकुल भिखारी होकर आया था। लेकिन, साधु ने उसे देखते ही कहा, ''मित्र, सभी कुछ साथ ले आये हो?'' राजा कुछ भी समझा नहीं सका।


साधु ने आश्रम के सारे कूड़ा-करकट फेंकने का काम उसे सौंपा। आश्रमवासियों को यह बहुत कठोर प्रतीत हुआ, लेकिन साधु बोला, ''सत्य को पाने के लिए वह अभी तैयार नहीं है और तैयार होना तो बहुत आवश्यक है!''

कुछ दिनों बाद आश्रमवासियों द्वारा राजा को उस कठोर कार्य से मुक्ति दिलाने की पुन: प्रार्थना करने पर प्रधान ने कहा, ''परीक्षा ले लें।'' फिर दूसरे दिन जब राजा कचरे की टोकरी सिर पर लेकर गांव के बाहर फेंकने जा रहा था, तो कोई व्यक्ति राह में उससे टकरा गया। राजा ने टकराने वाले से कहा, ''महानुभाव! आप इतने अंधे नहीं हो सकते !'' साधु ने यह प्रतिक्रिया जानकर कहा, ''क्या मैंने नहीं कहा था कि अभी समय नहीं आया है! वह अभी भी वही है!''

कुछ दिन बाद पुन: कोई राजा से टकरा गया। इस बार राजा ने आंख उठाकर उसे देखा भर, कहा कुछ भी नहीं। किंतु आंखों ने भी जो कहना था, कह ही दिया। साधु ने सुना तो वह बोला, ''संपत्ति को छोड़ना कितना आसान, स्वयं को छोड़ना कितना कठिन है!''

फिर तीसरी बार वही घटना हुई। राजा ने राह पर बिखर गये कचरे को इकट्ठा किया और अपने मार्ग पर चल गया, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो! उस दिन वह साधु बोला, ''वह अब तैयार है। जो मिटने को राजी हो, वही प्रभु को पाने का अधिकारी होता है।''

सत्य की आकांक्षा है, तो स्वयं को छोड़ दो। 'मैं' से बड़ा और कोई असत्य नहीं। उसे छोड़ना ही संन्यास है। क्योंकि, वस्तुत: मैं-भाव ही संसार है।

स्वर्ग और नरक कैसे हैं ?

शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, ''मैं जानना चाहता हूं कि स्वर्ग और नरक कैसे हैं?'' उसके गुरु ने कहा, ''आंखें बंद करो और देखो।'' उसने आंखें बंद की और शांत शून्यता में चला गया। फिर, उसके गुरु ने कहा,

''अब स्वर्ग देखो।'' और थोड़ी देर बाद कहा, ''अब नरक!''

जब उस शिष्य ने आंखें खोली थीं, तो वे आश्चर्य से भरी हुई थीं। उसके गुरु ने पूछा, ''क्या देखा?'' वह बोला, ''स्वर्ग में मैंने वह कुछ भी नहीं देखा, जिसकी कि लोग चर्चा करते हैं। न ही अमृत की नदियां थीं और न ही स्वर्ण के भवन थे- वहां तो कुछ भी नहीं था और नरक में भी कुछ नहीं था। न ही अग्नि की ज्वालाएं थी और न ही पीडितों के रुदन। इसका कारण क्या है? क्या मैंने स्वर्ग नरक देखें या कि नहीं देखे।''

उसका गुरु हंसने लगा और बोला, ''निश्चय ही तुमने स्वर्ग और नरक देखें हैं, लेकिन अमृत की नदियां और स्वर्ण के भवन या कि अग्नि की ज्वाला और पीड़ा का रुदन तुम्हें स्वयं ही वहां ले जाने होते हैं। वे वहां नहीं मिलते। जो हम अपने साथ ले जाते हैं, वही वहां हमें उपलब्ध हो जाते हैं। हम ही स्वर्ग हैं, हम ही नरक हैं।''

व्यक्ति जो अपने अंतस में होता है, उसे ही अपने बाहर भी पाता है। बाह्य, आंतरिक का प्रक्षेपण है। भीतर स्वर्ग हो, तो बाहर स्वर्ग है। और, भीतर नरक हो, तो बाहर नरक। स्वयं में ही सब कुछ छिपा है।

स्वयं को पाओ

स्वयं को पाओ और जो भी करो, ध्यान रखो कि वह स्वयं के पाने में सहयोगी बने। स्वयं से जो दूर ले जावे, वही है अधर्म और जो स्वयं में ले आवे, वही है धर्मं ''

स्वयं के भीतर प्रकाश की छोटी-सी ज्योति भी हो, तो सारे संसार का अंधेरा पराजित हो जाता है। और, यदि स्वयं के केंद्र पर अंधकार हो, तो बाह्याकाश के करोड़ों सूर्य भी उसे नहीं मिटा सकते हैं।


पाप से बचना चाहते हो ?

एक अंधकार पूर्ण रात्रि में किसी युवक ने एक साधु के झोपड़े में प्रवेश किया। उसने जाकर कहा, ''मैं आपका शिष्य होना चाहता हूं।'' साधु ने कहा, ''स्वागत है। परमात्मा के द्वार पर सदा ही सबका स्वागत है।'' वह युवक कुछ हैरान हुआ और बोला,

''लेकिन बहुत त्रुटियां हैं, मुझ में! मैं बहुत पापी हूं!'' यह सुन साधु हंसने लगा और बोला : ''परमात्मा तुम्हें स्वीकार करता है, तो मैं अस्वीकार करने वाला कौन हूं! मैं भी सब पापों के साथ तुम्हें स्वीकार करता हूं।'' उस युवक ने कहा, ''लेकिन मैं जुआ खेलता हूं, मैं शराब पीता हूं- मैं व्यभिचारी हूं।'' वह साधु बोला, ''मैंने तुम्हें स्वीकार किया, क्या तुम भी मुझे स्वीकार करोगे? क्या तुम जिन्हें पाप कह रहे हो, उन्हें करते समय कम से कम इतना ध्यान रखोगे कि मेरी उपस्थिति में उन्हें न करो। मैं इतनी तो आशा कर ही सकता हूं!'' उस युवक ने आश्वासन दिया। गुरु का इतना आदर स्वाभाविक ही था।

लेकिन कुछ दिनों बाद जब वह लौटा और उसके गुरु ने पूछा कि तुम्हारे उन पापों का क्या हाल है, तो वह हंसने लगा और बोला, ''मैं जैसे ही उनकी मूच्र्छा में पड़ता हूं कि आपकी आंखें सामने आ जाती हैं और मैं जाग जाता हूं। आपकी उपस्थिति मुझे जगा देती है। और, जागते हुए तो गड्ढों में गिरना असंभव है!''

पाप और पुण्य मात्र कृत्य ही नहीं हैं। वस्तुत: तो वे हमारे अंत:करण के सोये होने या जागे होने की सूचनाएं हैं। जो सीधे पापों से लड़ता है, या पुण्य करना चाहता है, वह भूल में है। सवाल कुछ 'करने' या 'न करने' का नहीं है। सवाल तो भीतर कुछ 'होने' या 'न-होने' का है। और, यदि भीतर जागरण है, होश है, स्व-बोध है, तो ही तुम हो, अन्यथा घर के मालिक के सोये होने पर जैसे चोरों को सुविधा होती है, वैसी ही सुविधा पापों को भी है।

मौन और शांति को पहचानो

साधु रिझांई एक दिन प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा, ''प्रत्येक भीतर, प्रत्येक के शरीर में वह मनुष्य छिपा है, जिसका कोई विशेषण नहीं है- न पद है, न नाम है। वह उपाधि शून्य मनुष्य ही शरीर की खिड़कियों में से बाहर आता है।

जिन्होंने यह बात आज तक नहीं देखी है, वे देखें, देखें। मित्रों! देखो! देखो!'' यह आवाहन सुनकर एक भिक्षु बाहर आया और बोला,''यह सत्य पुरुष कौन है? यह उपाधि शून्य सत्ता कौन है?'' रिंझाई नीचे उतरा और भिक्षुओं की भीड़ को पार कर उस भिक्षु के पास पहुंचा। सब चकित थे कि उत्तर न देकर, वह यह क्या कर रहा है? उसने जाकर जोर-से उस भिक्षु को पकड़ कर कहा, ''फिर से बोलो।'' भिक्षु घबड़ा गया और कुछ बोल नहीं सका। रिंझाई ने कहा,''भीतर देखो। वहां जो है- मौन और शांत- वही वह सत्य पुरुष है। वही हो तुम। उसे ही पहचानो। जो उसे पहचान लेता है, उसके लिए सत्य के समस्त द्वार खुल जाते हैं।''
पूर्णिमा की रात्रि में किसी झील को देखो। यदि झील निस्तरंग हो तो चंद्रमा का प्रतिबिंब बनता है। ऐसा ही मन है। उसमें तरंगें न हों, तो सत्य प्रतिफलित होता है। जिसके मन तरंगों से ढका है, वह अपने हाथों सत्य से स्वयं को दूर किये है। सत्य तो सदा निकट है, लेकिन अपनी अशांति के कारण हम सदा उसके निकट नहीं होते हैं।

03 April, 2009

गुरु-राहु की युति : जारी रहेगी मंदी

आज हम फख्र से कह रहे है कि भारत पर मंदी का असर नहीं होगा। लेकिन ये हकीकत नहीं है। हमारे देश के प्रधानमंत्री ने वित्त मंत्री भले ही बदल दिया हो, लेकिन भारत की स्थिति सर्विस के क्षेत्र में ठीक नहीं है।

अभी हाल ही में एक वर्ष तक के लिए आईटी के क्षेत्र में प्लेसमेंट के लिए कॉलेजों को मना कर दिया है। आज कोई भी पार्टी इस और ध्यान नहीं दे रही बस उन्हें अपने सत्ता सुख से मतलब है। आखिर जो विद्यार्थी भारी कर्ज लेकर अपनी पढ़ाई कर रहे है वे कहाँ जाएँगे। आज हर संस्थान कर्मचारियों को वैश्विक मंदी का वास्ता देकर निकाले जा रहे है। जिन्हे प्लेसमेंट मिला था उन्हें भी मना कर दिया गया और सरकार का इस और ध्यान नहीं है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा हैं ?

जब से गुरु-राहु का संयोग बना तब से कहीं ना कहीं गड़बड़ घोटाला चल रहा है। कई हजारों करोड़ रुपए जनता के शेयर बाजार लिल गया। इस संयोग से कई कम्पनियाँ झूठी हो सकती हैं। राहु-गुरु मिलकर चाण्डाल योग बनाने के कारण सज्जन पुरुष दु:खी व झूठे लोग मालामाल होते हैं। ऐसा शास्त्रों में भी बताया गया है।

राहु 3 नवम्बर से मकर राशि छोड़ कर धनु राशि में जाएगा। यह भी उसकी नीच राशि है लेकिन गुरु का साथ छोड़ने से अशुभता में कुछ कमी आ सकती है, वैसे गुरु की राशि में होने से विशेष अन्तर वाली बात नहीं रहेगी। राहु की स्थिति जब नीच की हो तब भी जिन जातकों की पत्रिका में राहु नीच का होगा उन्हें परेशानी में डालेगा।

ऐसी स्थिति वाले जातकों को महामृत्युन्जय मन्त्र का जाप अवश्य करना चाहिए। ताकि अशुभ प्रभाव से बचा जा सकें। जिनकी पत्रिका में गुरु-राहु साथ होता है उनका दिमाग अक्सर गलत रास्ते पर चलता है, या उनके दिमाग में कुछ न कुछ फितरत चलती रहती है। ऐसे जातकों को राहु की शान्ति अवश्य करना चाहिए। वैसे देखा जाए तो राहु आकाश मण्डल में दिखाई देने वाला ग्रह नहीं है।यह सिर्फ छाया ग्रह हैं। जिस ग्रह के साथ रहता है उसके प्रभाव को नष्ट कर देता है।

यह वृषभ में उच्च का, मिथुन में अपनी राशि का माना जाता है। वैसे मिथुन में उच्च का भी माना जाता है। बस इन्हीं राशियों में अपना शुभ प्रभाव देता हैं। शनि के साथ हो तो करेला नीम चढ़ा वाली बात रखता है।

(Source: webdunia.com)